आईआईटी दिल्ली से गोल्ड मेडल जीतने वाले संदीप भट्ट ने अपने करियर की ऊँचाई पर पहुँचकर जब संन्यास लेने का निर्णय लिया, तो यह खबर सभी के लिए चौंकाने वाली थी। उन्होंने लाखों के पैकेज को छोड़कर अध्यात्म की राह चुनी और अब वे स्वामी सुंदर गोपाल दास के नाम से जाने जाते हैं।
करियर की ऊँचाई पर छोड़ी नौकरी
संदीप भट्ट ने 2002 में आईआईटी दिल्ली से बीटेक में गोल्ड मेडल प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने एमटेक किया और 2004 से 2007 तक एक बड़ी कंपनी में काम किया। जब उन्होंने इस्तीफा देने का निर्णय लिया, उसी समय उन्हें प्रमोशन का पत्र मिला था जिसमें उनकी सैलरी दोगुनी होने वाली थी। लेकिन संदीप ने महसूस किया कि देश में पुल और मशीनें बनाने वाले इंजीनियरों की कोई कमी नहीं है, बल्कि असली कमी है इंसानी चरित्र सुधारने वालों की।
अध्यात्म की ओर रुझान
संदीप का मानना है कि आज के समय में मशीनें तो सुधर रही हैं, लेकिन इंसान भीतर से खोखला होता जा रहा है। उनके अनुसार, हर साल लाखों लोग और छात्र अवसाद के कारण आत्महत्या कर लेते हैं। उन्हें करियर बनाने की शिक्षा दी जाती है, लेकिन जीवन जीने की नहीं। संदीप कहते हैं कि इच्छाओं की अंधी दौड़ में लोग भाग रहे हैं और इसी कारण मानसिक तनाव और अवसाद बढ़ रहे हैं।
मूल्य आधारित जीवन की आवश्यकता
स्वामी सुंदर गोपाल दास के अनुसार, पश्चिमी संस्कृति की नकल करने के बजाय हमें अपनी अमूल्य विरासत की ओर लौटना चाहिए। उनका कहना है कि असली शांति तब ही मिलेगी जब हम अपने भीतर के नैतिक मूल्यों को पहचानेंगे। वे कहते हैं कि जब तक हम खुद को केवल एक शरीर मानकर भौतिक चीजों के पीछे भागते रहेंगे, तब तक तनाव और अवसाद पीछा नहीं छोड़ेगा।
Source: NDTV India
