भारत में चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह प्रक्रिया भारत के संविधान के तहत 1950 के लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) के अंतर्गत चुनाव आयोग को दी गई है।
मतदाता शुद्धिकरण की प्रक्रिया
चुनाव आयोग ने अब तक 13 बार मतदाता सूची का निरीक्षण किया है, जिसमें 1952 से 2004 के बीच विभिन्न वर्षों में यह प्रक्रिया संपन्न हुई। वर्तमान में, 2025 में बिहार से शुरू किया गया 14वां विशेष गहन पुनरीक्षण चल रहा है। 2004 से अब तक 22 वर्षों में यह प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए थी, जो कि नहीं हो पाई।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल वैध भारतीय नागरिक ही चुनाव में मतदान कर सकें। रिपोर्ट्स के अनुसार, देश में गहन पुनरीक्षण के बाद लगभग 2.80 करोड़ मृतकों के नाम मतदाता सूची में पाए गए हैं। इसके अलावा, 6.30 करोड़ लोगों ने स्थान परिवर्तन कर दूसरे स्थान पर अपने नाम जुड़वा लिए थे, और 3 करोड़ मतदाताओं की स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी।
घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा
असम के पूर्व राज्यपाल एस. के. सिन्हा ने 1998 में अपनी रिपोर्ट में अवैध घुसपैठियों के खतरों को उजागर किया था। उन्होंने बताया कि असम में लगभग 60 लाख घुसपैठिए थे, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा थे। गृह राज्य मंत्री के अनुसार, भारत में 2 करोड़ से अधिक अवैध घुसपैठिए रह रहे हैं।
पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद बांग्लादेशी घुसपैठियों ने बांग्लादेश की ओर पलायन किया, जिन्होंने स्वीकार किया कि नेताओं द्वारा अवैध रूप से उन्हें मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, पैन कार्ड और राशन कार्ड उपलब्ध कराए गए थे।
लोकतंत्र की सुरक्षा
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध में उठ रही आवाजों के बावजूद, यह प्रक्रिया लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। निर्वाचन आयोग एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया के तहत यह कार्य करता है, जिसमें प्रदेश स्तर से बूथ स्तर तक सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति होती है।
राजनीतिक दलों से भी अपेक्षा की जाती है कि वे इस प्रक्रिया में भाग लें और लोकतंत्र को मजबूत करने में सहयोग करें। फार्म 6-7-8 का उपयोग कर मतदाता सूची के शुद्धिकरण का प्रयास किया जाता है।
इस प्रक्रिया का समर्थन करने में विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, जिससे चुनाव में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।
Source: NDTV India
