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अमरीश पुरी: थिएटर से बॉलीवुड के यादगार विलेन तक का सफर

मुंबई, जो अपनी चकाचौंध और सपनों को साकार करने की संभावनाओं के लिए जानी जाती है, ने कई कलाकारों की कहानियों को जन्म दिया है। इन्हीं में से एक कहानी है अमरीश पुरी की, जिन्होंने 1954 में हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई का रुख किया था। हालांकि, एक स्क्रीन टेस्ट के दौरान उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया। लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय थिएटर की दुनिया में कदम रखा और अपनी एक अलग पहचान बनाई।

थिएटर से फिल्मों तक का सफर

अमरीश पुरी ने करीब 16 साल तक थिएटर में काम किया और अपनी दमदार आवाज के कारण विज्ञापनों के लिए जिंगल्स भी दिए। 1970 में फिल्म ‘प्रेम पुजारी’ से उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। हालांकि, उन्हें पहचान मिलने में समय लगा, लेकिन उनकी अदाकारी और आवाज ने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार विलेन बना दिया।

उनके करियर को एक नई दिशा देने में निर्देशक श्याम बेनेगल का महत्वपूर्ण योगदान रहा। 1975 की फिल्म ‘निशांत’ में उन्होंने एक दबंग जमींदार का किरदार निभाया, जिससे उन्हें पहचान मिली। इसके बाद ‘मंथन’ और ‘भूमिका’ जैसी फिल्मों में भी उनकी अदाकारी ने दर्शकों को प्रभावित किया।

‘मिस्टर इंडिया’ और अमरीश पुरी की पहचान

1987 में आई फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ अमरीश पुरी के करियर का मील का पत्थर साबित हुई। शेखर कपूर के निर्देशन में बनी इस फिल्म में उन्होंने मुगैंबो का किरदार निभाया, जो आज भी लोगों की जुबान पर है। ‘मुगैंबो खुश हुआ’ वाला उनका डायलॉग अमर हो गया। इस किरदार की तैयारी में उनकी खुद की राय भी शामिल थी, जिसमें उन्होंने अपने लुक को खास बनाया।

विलेन ही नहीं, दिल जीतने वाले किरदार भी

अमरीश पुरी ने सिर्फ विलेन के किरदार ही नहीं निभाए, बल्कि ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में काजोल के पिता चौधरी बलदेव सिंह का किरदार निभाया। ‘जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी’ वाला उनका डायलॉग आज भी याद किया जाता है। इसके अलावा ‘घायल’, ‘नगीना’, ‘करण अर्जुन’, ‘दामिनी’ और ‘ताल’ जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी अदाकारी का जलवा बिखेरा।

अमरीश पुरी ने हॉलीवुड फिल्म ‘इंडियाना जोन्स एंड द टेंपल ऑफ डूम’ में भी काम किया। 12 जनवरी 2005 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी आवाज और अदाकारी ने उन्हें हिंदी सिनेमा का एक विशेष कलाकार बना दिया है।

Source: NDTV India

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