वाशिंगटन में आयोजित एक सेमिनार में उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने चेतावनी दी कि सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान को आवंटित जल से वंचित करने का कोई भी प्रयास क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के लिए गहरे परिणाम ला सकता है।
संधि के महत्व पर जोर
1960 में हुई सिंधु जल संधि, जिसे भारत ने 2025 में स्थगित करने का निर्णय लिया, पर चर्चा करते हुए डार ने कहा कि यह संधि वैध, बाध्यकारी और पूर्ण रूप से क्रियाशील है। उन्होंने कहा कि एकतरफा निर्णय से संधि को निलंबित नहीं किया जा सकता।
डार ने कहा कि संधि का महत्व द्विपक्षीय संबंधों से परे है और यह अंतरराष्ट्रीय कानून में विश्वास को भी प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि अगर राजनीतिक संबंध खराब होते हैं तो संधियों का उद्देश्य भी विफल हो जाता है।
जलवायु परिवर्तन और जल सुरक्षा
डार ने जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में कहा कि पाकिस्तान पहले से ही जल संकट से जूझ रहा है। उन्होंने बेहतर डेटा साझाकरण और पारदर्शिता की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि सिंधु जल संधि ने 65 वर्षों से अधिक समय तक दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण संसाधन को राजनीतिक संबंधों से अलग रखा है, और इसे संरक्षित किया जाना चाहिए।
विवाद समाधान के उपाय
डार ने कहा कि संधि के अंतर्गत विवाद समाधान के लिए संवाद, तकनीकी सहभागिता और कानूनी विवाद समाधान का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की प्राथमिकता कानून के माध्यम से समाधान प्राप्त करना है।
डार ने जोर दिया कि पाकिस्तान अपने जल अधिकारों को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय महत्व का मामला मानता है और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सुरक्षित करेगा।
डार ने यह भी कहा कि साझा जल संसाधनों को कभी भी हथियार नहीं बनाना चाहिए। वे राष्ट्रों के बीच सेतु बने रहें, कानून द्वारा शासित और सहयोग के माध्यम से संरक्षित रहें।
