पाकिस्तान की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा युवा है, जिसमें दो तिहाई लोग 30 वर्ष से कम उम्र के हैं। सवाल यह नहीं है कि जनरेशन Z पाकिस्तान को बदल देगी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वे इसके लिए तैयार होंगे। वर्तमान व्यवस्था को देखते हुए, ऐसा लग नहीं रहा है कि यह पीढ़ी पूरी तरह से तैयार होगी।
संविधान और वास्तविकता के बीच का अंतर
पाकिस्तान के संविधान और उसकी वास्तविक कार्यप्रणाली के बीच बड़ा अंतर है, जिसे इस पीढ़ी को पाटना होगा। जब मैं 14 वर्ष का था, तब मार्शल लॉ आया और मैंने देखा कि कैसे सत्ता ने खुद को समझाने की जरूरत नहीं समझी। बोलने वाले व्यक्ति का तबादला हो जाता था और चुप रहने वाला व्यक्ति तरक्की पाता था।
संवाद की शक्ति
पाकिस्तान की अगली पीढ़ी को विरोध प्रदर्शन से नहीं, बल्कि संवाद से गढ़ा जाएगा। इसके लिए एक मंच पहले से ही मौजूद है – विश्वविद्यालय का कक्षा। हर कक्षा को एक छोटी गणराज्य के रूप में चलाना चाहिए, जहां विषय पर गहन चर्चा हो।
कानून की कक्षा में यह चर्चा होनी चाहिए कि क्या निर्णय सही था। चिकित्सा की कक्षा में प्राथमिकता और सहमति पर बहस होनी चाहिए। इंजीनियरिंग की कक्षा में यह चर्चा होनी चाहिए कि क्या बनाया गया, किसने भुगतान किया, और इसके पास कौन रहेगा।
वास्तविक दुनिया का अनुभव
शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को देश की वास्तविक स्थिति से अवगत कराना है। कानून की कक्षा को जिला अदालत ले जाया जाना चाहिए, चिकित्सा की कक्षा को रात में सार्वजनिक वार्ड में ले जाना चाहिए, और इंजीनियरिंग की कक्षा को परियोजना के पास स्थित बस्ती में ले जाना चाहिए।
इस तरह की शिक्षा से तैयार युवा पुरुष और महिलाएं अधिक प्रभावी होंगी। यह पीढ़ी इतनी सक्षम और जुड़ी होगी कि इसे बिना सहमति के नहीं चलाया जा सकेगा।
भविष्य की तैयारी
इस बदलाव को लागू होने में दो दशक लग सकते हैं, लेकिन इसे अभी से शुरू करना आवश्यक है। संविधान में जो अधिकार दिए गए हैं, उन्हें वास्तविकता में लाना इस पीढ़ी का काम है। उन्हें सत्ता को जिम्मेदार ठहराना सीखना होगा, और यह कक्षा में एक बहस और चुनाव से शुरू होता है।
