ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों की छाया गहराई हुई है। इस बार का सम्मेलन दिल्ली में आयोजित हो रहा है, जहां भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मेजबानी कर रहे हैं।
ब्रिक्स की चुनौतियाँ और अमेरिकी प्रभाव
ब्रिक्स के सदस्य देशों में भारत, चीन, रूस, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, यूएई और ईरान शामिल हैं। इस बार सऊदी अरब को आमंत्रित सदस्य के रूप में बुलाया गया है। हालांकि, अमेरिका इस समूह का हिस्सा नहीं है, लेकिन ट्रंप की नीतियों का असर इस समूह पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
ईरान में युद्ध और व्हाइट हाउस द्वारा लगाए गए टैरिफ ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर दिया है। इसके चलते वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इन परिस्थितियों में ब्रिक्स नेताओं की बैठक हो रही है।
विभाजन और सहमति की कठिनाइयाँ
ब्रिक्स के भीतर अमेरिका के खिलाफ एकजुटता की कमी है। भारत और चीन जैसे देश अमेरिकी नीतियों के खिलाफ खुलकर बयान देने से बच रहे हैं। इस समूह के भीतर विभिन्न देशों की भिन्न-भिन्न प्राथमिकताएं और चिंताएं हैं।
विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन के अनुसार, ब्रिक्स का विस्तार इसे और महत्वपूर्ण बना रहा है, लेकिन इसके साथ ही सहमति बनाना और कठिन हो गया है। उन्होंने कहा कि भारत के लिए चुनौती यह है कि वह ऐसे देशों को एकजुट करे जिनके वैश्विक दृष्टिकोण और स्थिति में व्यापक अंतर है।
भविष्य की दिशा और आर्थिक सहयोग
ब्रिक्स के नेताओं के लिए यह एक अवसर है कि वे समूह की उपलब्धियों को बढ़ावा दें। न्यू डेवलपमेंट बैंक और 100 बिलियन डॉलर का आपातकालीन कोष इस समूह की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल हैं।
आर्थिक सहयोग को मजबूत करने के लिए नेताओं के बीच चर्चा होगी। विशेष रूप से, स्थानीय मुद्राओं में सीमा पार भुगतान को आसान बनाने के तरीकों पर ध्यान दिया जाएगा। यह मास्को और तेहरान के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं।
भारत के लिए अवसर और चुनौती
भारत के लिए यह सम्मेलन वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व को मजबूत करने का एक अवसर है। हालांकि, चीन के व्यापक प्रभाव को देखते हुए, भारत को सावधानीपूर्वक कदम उठाने होंगे।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण अवसर है कि वह अपनी वैश्विक स्थिति को पुनः स्थापित करे। पाकिस्तान की मध्य पूर्व में हालिया कूटनीतिक भूमिका ने भारत को कुछ हद तक पीछे छोड़ दिया है, लेकिन यह सम्मेलन भारत को अपनी भूमिका को फिर से स्थापित करने का मौका देता है।
