अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने शुक्रवार को अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) पर प्रतिबंध लगाए, जिससे वाशिंगटन का यूरोपीय सहयोगियों के साथ कूटनीतिक टकराव हो गया। यह कदम उस समय आया जब आईसीसी के एक पूर्व न्यायाधीश को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था पर हमला
न्यायालय ने इस कदम की निंदा करते हुए इसे “कानून के शासन और अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था की नींव पर हमला” कहा। न्यायालय ने अपने 125 सदस्य देशों से इसे बचाने के लिए कार्रवाई करने का आह्वान किया। आईसीसी ने एक बयान में कहा कि न्यायालय अकेला नहीं खड़ा हो सकता और इसका भविष्य उन देशों के हाथ में है जिन्होंने इसे बनाया है।
आईसीसी ने कहा, “न्यायालय स्वतंत्रता और निष्पक्षता के साथ कानून और साक्ष्यों के आधार पर अपने कर्तव्यों का पालन करता रहेगा, ताकि गंभीर अपराधों के अनगिनत पीड़ितों के लिए न्याय सुनिश्चित किया जा सके।”
विरोध और समर्थन
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने आईसीसी पर अमेरिकी प्रतिबंधों की निंदा करते हुए कहा कि अंतर्राष्ट्रीय अपराधों के लिए जवाबदेही और पीड़ितों को न्याय दिलाना वैश्विक शांति, सुरक्षा, मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं के लिए केंद्रीय है। उन्होंने न्यायालय और उसके अधिकारियों की स्वतंत्रता के लिए अपना समर्थन दोहराया।
कनाडा, डेनमार्क, जर्मनी, फ्रांस, इटली, जापान, नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम के विदेश मंत्रालयों ने एक संयुक्त बयान जारी कर अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध किया। उन्होंने आईसीसी के कार्य में समर्थन बनाए रखने की बात कही।
यूरोपीय संघ और अन्य देशों की प्रतिक्रिया
बेल्जियम ने इन प्रतिबंधों की आलोचना करते हुए कहा कि “आईसीसी को स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति होनी चाहिए।” यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कल्लास ने आईसीसी को अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्याय प्रणाली का “कोणीय पत्थर” बताया और कहा कि यूरोपीय संघ हमेशा से न्यायालय का समर्थन करता रहा है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की महासचिव एग्नेस कैलामार्ड ने इन प्रतिबंधों को अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक कानून के सिद्धांतों के साथ “विश्वासघात” बताया। उन्होंने यूरोपीय सरकारों से आग्रह किया कि वे यूरोपीय क्षेत्र में इन प्रतिबंधों के कार्यान्वयन को रोकने के लिए तुरंत आदेश जारी करें।
Source: Dawn (English)
