उत्तराखंड के एक एकांत गांव की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म ‘पायरे’ ने अपनी भावुक कहानी से दर्शकों का दिल जीत लिया है। यह फिल्म एक बुजुर्ग दंपति की मार्मिक कहानी को पेश करती है जो पलायन, अकेलेपन और रिश्तों की जटिलताओं को उजागर करती है।
फिल्म की कहानी और पृष्ठभूमि
‘पायरे’ का अर्थ ‘चिता’ होता है और यह फिल्म दर्शाती है कि कैसे उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के एक छोटे से गांव में रहने वाले 80 वर्षीय पदम सिंह और उनकी पत्नी तुलसी अकेलेपन से जूझते हैं। गांव में बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण अधिकांश लोग पलायन कर चुके हैं, जिससे गांव लगभग खाली हो चुका है।
तुलसी की तबीयत खराब हो जाने पर पदम सिंह उसे अस्पताल ले जाने के लिए गांव के दो युवकों की मदद मांगते हैं। परंतु जब डॉक्टर दोबारा जांच के लिए बुलाता है, तब तक युवक भी गांव छोड़ने की तैयारी में होते हैं। इस बीच, उन्हें अपने बेटे की याद सताने लगती है, जो 28 साल पहले शहर चला गया था।
तुलसी और पदम की संघर्षपूर्ण यात्रा
फिल्म में एक दिन तुलसी को अपने बेटे के लौटने की खबर मिलती है, परंतु खुशी के बावजूद उनका इंतजार खत्म नहीं होता। धीरे-धीरे गांव के बचे हुए लोग भी चले जाते हैं। पदम और तुलसी अपने अंतिम संस्कार की चिंता में घिर जाते हैं।
पदम दो चिताएं तैयार करता है और तुलसी से साथ मरने की बात करता है। तुलसी इसे गंभीरता से नहीं लेती, लेकिन एक दिन पदम चिता पर लेटा मिलता है। तुलसी, अकेली रह जाती है और अपने पति का अंतिम संस्कार स्वयं करती है। कुछ समय बाद बेटे के नाम से एक चिट्ठी आती है, जो कहानी को नया मोड़ देती है।
निर्माण और पुरस्कार
फिल्म का निर्देशन विनोद कापड़ी ने किया है, जो इस सच्ची घटना से प्रेरित हैं। एक ट्रैकिंग यात्रा के दौरान मुनस्यारी में उन्होंने इस दंपति से मुलाकात की थी और उनकी कहानी ने उन्हें फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया। इस फिल्म को बनाने में आठ साल लगे।
‘पायरे’ ने टालिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल में ऑडियंस अवॉर्ड, लंदन और बर्मिंघम इंडियन फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म ऑडियंस अवॉर्ड और शिकागो साउथ एशियन फिल्म फेस्टिवल में ऑडियंस च्वॉइस अवॉर्ड सहित कई पुरस्कार जीते।
यह फिल्म न केवल एक बुजुर्ग दंपति की कहानी है, बल्कि पहाड़ों से हो रहे पलायन और बुढ़ापे में अकेलेपन की गहरी तस्वीर पेश करती है।
Source: NDTV India
