फ्रांस में हालिया जनविद्रोह का एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि यह मरीन ले पेन के एलिसी पैलेस तक पहुंचने की राह आसान कर सकता है। राष्ट्रपति पद के लिए यह दक्षिणपंथी दावेदार कानून और व्यवस्था के रक्षक के रूप में प्रस्तुत होती हैं, जबकि फ्रांस की वास्तविकता इससे बहुत अलग है। यह स्थिति अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प के शासन की तरह ही आप्रवासन को हर सामाजिक समस्या की जड़ मानती है।
फ्रांस में विद्रोह की लहर
सितंबर में कुछ सार्वजनिक हाई स्कूलों के छात्रों द्वारा संसाधनों की कमी और अपर्याप्त सुविधाओं की शिकायत के कारण शुरू हुआ यह आंदोलन अब व्यापक विद्रोह का रूप ले चुका है। पिछले सप्ताहांत तक, ये प्रदर्शन केवल असंतुष्ट छात्रों, उनके माता-पिता और शिक्षकों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि समाज के एक बड़े हिस्से ने महंगाई के खिलाफ आवाज उठाई। हालांकि, इन शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बीच कुछ उपद्रवी तत्व भी शामिल हो गए, जिन्होंने हिंसा और आगजनी का सहारा लिया।
हालांकि, अधिकांश रिपोर्टों ने इन विशाल मार्च को एक उत्सव की तरह बताया, जो अवसरवादी गिरोहों की आपराधिक गतिविधियों से अलग है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी अपने संबोधन में इस अंतर को स्पष्ट किया, लेकिन उन्होंने अपराधियों के लिए केवल दंड का प्रस्ताव रखा और ‘स्टेकहोल्डर्स’ के साथ संवाद की बात की।
आर्थिक संकट और संभावित समाधान
फ्रांस का राष्ट्रीय कर्ज उसकी जीडीपी का 119 प्रतिशत है, और इसे शिक्षा या स्वास्थ्य पर खर्च के लिए धन की कमी के बहाने के रूप में देखा जाता है। हालांकि, अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सबसे धनी एक प्रतिशत उत्तराधिकारियों पर विरासत कर में थोड़ी वृद्धि से शिक्षा में पर्याप्त निवेश संभव हो सकता है। थॉमस पिकेटी का कहना है कि निजी संपत्ति की वृद्धि के कारण फ्रांस कभी भी इतना समृद्ध नहीं रहा, भले ही उसका सार्वजनिक कर्ज बढ़ा हो।
अन्य देशों में विद्रोह की स्थिति
फ्रांस की घटनाओं में 1968 की गूंज देखी गई है। उस समय, विश्वविद्यालय के छात्रों ने यूनियनबद्ध श्रमिक वर्ग के समर्थन से चार्ल्स डी गॉल को सत्ता से बेदखल किया था। यूरोप के अन्य हिस्सों में भी आर्थिक संकट के कारण बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। स्पेन में आवास संकट के कारण लोग सड़कों पर उतर आए हैं, और पुर्तगाल, बेल्जियम, इटली में भी महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं।
भारत और पाकिस्तान की स्थिति
भारत में स्थिति कुछ अलग है। यहां की सरकार को विपक्षी दलों ने चुनौती दी है, लेकिन इसका पतन निकट नहीं है। पाकिस्तान में हाल ही में एक निजी स्कूल की छत गिरने से हुई त्रासदी के बाद भी सरकार पर शिक्षा पर खर्च बढ़ाने का दबाव नहीं है।
Source: Dawn (English)
