अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन में वर्तमान में भारी बदलाव हो रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार के दौरान, रक्षा सचिव पीट हिग्सेथ ने पेंटागन में बड़े स्तर पर सुधार करने का वादा किया था। इस कदम ने हाल ही में कई वरिष्ठ अधिकारियों की विदाई का कारण बना है। इस बीच, अमेरिकी सेना दो महत्वपूर्ण मोर्चों पर संघर्ष कर रही है। एक ओर, ट्रंप प्रशासन ईरान के हाथों से होरमुज की खाड़ी को छीनने की कोशिश में है, जबकि दूसरी ओर, पेंटागन के अंदर एक सांस्कृतिक युद्ध छिड़ा हुआ है।
ड्रिस्कॉल का इस्तीफा और सैन्य नेतृत्व में परिवर्तन
पिछले सप्ताह, अमेरिकी सेना के सचिव डैन ड्रिस्कॉल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस इस्तीफे ने पेंटागन के अंदर चल रहे सत्ता संघर्ष को उजागर किया। ड्रिस्कॉल ने सेना में आधुनिकता लाने के लिए ड्रोन जैसी तकनीकों को अपनाने की वकालत की थी, लेकिन हिग्सेथ के साथ उनके मतभेद बढ़ते गए।
ड्रिस्कॉल का मानना था कि 21वीं सदी के युद्ध के लिए अमेरिकी सेना को तैयार करने की जरूरत है। हालांकि, हिग्सेथ ने उनके इस प्रयास को बाधित किया, जिससे सैन्य नेतृत्व में अस्थिरता बढ़ी।
पेंटागन में सांस्कृतिक बदलाव
हिग्सेथ ने अमेरिकी सेना में सांस्कृतिक बदलाव की पहल की है। उन्होंने ‘वोक’ पहल को समाप्त करने की बात की और सेना में अनुशासन स्थापित करने की कोशिश की। इसके तहत, उन्होंने विविधता कार्यक्रमों को खत्म किया और कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को पद से हटा दिया।
इस बदलाव के कारण कई आलोचक हिग्सेथ की तुलना चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सैन्य शुद्धिकरण से कर रहे हैं। इस बीच, उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस ने हिग्सेथ का समर्थन किया और कहा कि यह बदलाव अमेरिका के योद्धा भावना को पुनर्जीवित करने के लिए आवश्यक था।
अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर अमेरिका की स्थिति
ईरान के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई के बाद से यूरोप और एशिया में अमेरिकी सैन्य संसाधनों का पुनर्वितरण हुआ है। यूरोप में अमेरिकी सैनिकों की संख्या में कटौती की गई है, जिससे नाटो देशों के साथ संबंधों में खटास आई है।
रूस ने इस स्थिति का फायदा उठाकर नाटो देशों पर ‘हाइब्रिड’ हमले तेज कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय अमेरिका और यूरोप के बीच एकजुटता की कमी है, जिससे रूस को और अधिक आक्रामक होने का मौका मिल रहा है।
हालांकि, व्हाइट हाउस के अनुसार, अमेरिकी सैन्य ताकत अब तक के सबसे मजबूत स्तर पर है। लेकिन इस स्थिति ने अमेरिकी सैन्य रणनीति और वैश्विक सुरक्षा पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
