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Explained: अमेरिका से इजरायल पहुंचा, फिर तुर्किये की झोली में आया F-35 फाइटर जेट! ट्रंप की डील से नेतन्याहू परेशान क्यों?


7 जुलाई 2026 को तुर्किये की राजधानी अंकारा में NATO समिट चल रही थी. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगान साथ-साथ बैठे थे. ट्रंप ने एक ऐसा ऐलान किया जिसने पूरे मिडिल ईस्ट की राजनीति को हिला दिया, ‘हम तुर्किये को F-35 लड़ाकू विमान बेचने पर विचार कर रहे हैं.’ यह ऐलान सुनते ही इजरायल सतर्क हो गया. इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने तुरंत विरोध जताते हुए कहा कि F-35 बेचने से मिडिल ईस्ट की ताकत का संतुलन बिगड़ जाएगा. यह सिर्फ एक हथियार की खरीद-फरोख्त नहीं है. यह मिडिल ईस्ट की राजनीति, अमेरिकी रणनीति और इजरायल की सुरक्षा से जुड़ा मामला है…

F-35 फाइटर जेट क्यों है इतना खास?

F-35 दुनिया के सबसे एडवांस फाइटर जेट में से एक है. यह स्टील्थ टेक्नोलॉजी (रेडार से बचने की तकनीक) से लैस है, यानी दुश्मन का रडार इसे आसानी से नहीं पकड़ सकता. यह पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान है, जिसे अमेरिका ने अपने सबसे करीबी सहयोगियों को ही बेचा है.

अब तक मिडिल ईस्ट में सिर्फ इजरायल के पास F-35 थे. इजरायल ने इन्हें कई सालों से ऑपरेट किया है और कई स्क्वाड्रन बना लिए हैं. यही इजरायल को मिडिल ईस्ट में हवाई शक्ति में सबसे बड़ी बढ़त देता है.

तुर्किये को F-35 क्यों नहीं मिल रहा था?

तुर्किये मूल रूप से F-35 प्रोग्राम का हिस्सा था और उसने अमेरिका से F-35 खरीदने का समझौता भी किया था. लेकिन 2019 में तुर्किये ने रूस से S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीद लिया. अमेरिका को डर था कि अगर तुर्किये के पास S-400 और F-35 दोनों होंगे, तो रूस को F-35 की गुप्त तकनीक का पता चल सकता है.

अमेरिका ने 2020 में तुर्किये को F-35 प्रोग्राम से निकाल दिया और उस पर प्रतिबंध लगा दिए.

अब अचानक अमेरिका ने क्यों बदली रणनीति?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप की सोच बदल गई है. वे तुर्किये को पश्चिमी व्यवस्था के केंद्र में वापस लाना चाहते हैं. उनका तर्क है, ‘मैं दोस्तों पर प्रतिबंध नहीं लगाना चाहता.’

ट्रंप की नजर में तुर्किये NATO की एक बड़ी ताकत है. तुर्किये काला सागर और भूमध्य सागर के बीच का रास्ता कंट्रोल करता है. सीरिया में उसका प्रभाव है, ईरान   को वह अच्छे से जानता है और उसके पास NATO की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है. ट्रंप को लगता है कि तुर्किये को पश्चिमी खेमे में बनाए रखना अमेरिका के हित में है.

ट्रंप ने यह भी कहा, ‘तुर्किये कई मामलों में दूसरे देशों से ज्यादा वफादार रहा है. ईरान-अमेरिका जंग के दौरान उसने ईरान का साथ नहीं दिया.’

इस मामले में इजरायल क्यों है इतना परेशान?

इजरायल के लिए यह मामला अस्तित्व से जुड़ा है. इजरायल मिडिल ईस्ट में अपनी हवाई बढ़त को अपनी सुरक्षा की रीढ़ मानता है. नेतन्याहू ने साफ कहा, ‘तुर्किये को F-35 देने से मिडिल ईस्ट की ताकत का संतुलन बिगड़ जाएगा.’ उन्होंने ट्रंप से कहा, ‘यह तुर्किये को अमेरिका का दोस्त नहीं बनाएगा.’

इजरायल के लिए तुर्किये कोई आम पश्चिमी सहयोगी नहीं रहा. तुर्किये:

  • हमास को राजनीतिक समर्थन देता है.
  • गाजा, लेबनान और सीरिया में इजरायल की कार्रवाइयों की लगातार आलोचना करता है.
  • ग्रीस और साइप्रस के साथ विवाद रखता है.
  • पूर्वी भूमध्य सागर में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है.

तो क्या ‘बीबी’ को नाराज करके ट्रंप यह डील करेंगे?

अमेरिका और तुर्किये के बीच डील इतनी आसान नहीं है. ट्रंप की मंजूरी के बावजूद, अमेरिकी कानून और कांग्रेस बड़ी रुकावट हैं.

  • CAATSA कानून: 2020 में अमेरिकी कांग्रेस ने एक कानून पास किया था, जब तक तुर्किये के पास S-400 सिस्टम है, तब तक उसे F-35 नहीं बेचा जा सकता.
  • कांग्रेस का विरोध: 18 अमेरिकी सांसदों ने संयुक्त पत्र लिखकर कहा कि मौजूदा हालात में तुर्किये को F-35 बेचना अमेरिकी कानून का उल्लंघन होगा.
  • तकनीकी खतरा: कांग्रेस को डर है कि S-400 और F-35 साथ होने पर रूस को F-35 की रडार तकनीक का पता चल सकता है.

व्हाइट हाउस के अंदर भी मतभेद हैं. वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने कहा कि F-35 की बिक्री के लिए कांग्रेस की मंजूरी और तुर्किये के अमेरिकी शर्तों पर खरे उतरने की जरूरत होगी.



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