सुप्रीम कोर्ट ने 27 साल पुराने टैक्स विवाद को समाप्त करते हुए यह निर्णय दिया है कि राज्य सरकारों को अतिरिक्त बिक्री कर, सरचार्ज और सेस लगाने का अधिकार है। इस फैसले से राज्यों के कराधिकार को एक महत्वपूर्ण समर्थन मिला है।
संविधान पीठ का फैसला
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में सात जजों की संविधान पीठ ने यह फैसला सुनाया। पीठ में जस्टिस के.वी. विश्वनाथन, जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी, जस्टिस जॉयमाल्य बागची, जस्टिस एन.वी. अंजारिया, जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस वी. मोहन शामिल थे। अदालत ने कहा कि यदि अतिरिक्त कर की गणना बिक्री कर की देय राशि के प्रतिशत के आधार पर की जाती है, तो उसे बिक्री कर से अलग नहीं माना जा सकता।
विवाद की पृष्ठभूमि
इस विवाद की जड़ ओडिशा सेल्स टैक्स एक्ट, 1947 की धारा 5A में थी, जिसके तहत कारोबारियों से अतिरिक्त बिक्री कर वसूला जाता था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह अतिरिक्त कर आयकर के समान है, जो केवल संसद का अधिकार है।
पुराने फैसलों से उत्पन्न भ्रम
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में अलग-अलग कानूनी व्याख्याएं सामने आई थीं। एस. कोदार मामले में अतिरिक्त बिक्री कर को वैध ठहराया गया था, जबकि इंडिया सीमेंट्स मामले में खनन रॉयल्टी पर लगाए गए सेस को निरस्त कर दिया गया था। इन परस्पर विरोधाभासी निर्णयों के कारण यह मामला 1999 में सात जजों की संविधान पीठ को भेजा गया था।
जीएसटी के बाद की स्थिति
जीएसटी के लागू होने के बाद से ऐसे विवाद काफी हद तक अप्रासंगिक हो चुके हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि जीएसटी के आने के बाद इस प्रकार के मामले अब बहुत कम रह गए हैं। अदालत ने भी यह स्पष्ट किया कि किसी कर का नाम बदलने से उसकी संवैधानिक प्रकृति नहीं बदलती।
Source: NDTV India
