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पियूष गोयल ने जलवायु वित्त पर उठाए सवाल, विकसित देशों की भूमिका पर कसा तंज

भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पियूष गोयल ने जलवायु परिवर्तन पर एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने विकसित देशों पर आरोप लगाया कि वे ऐतिहासिक रूप से वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में सबसे बड़ा योगदान देते हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ये देश पेरिस समझौते के तहत विकासशील और संवेदनशील देशों को दिए जाने वाले वित्तीय और तकनीकी समर्थन से मुकर रहे हैं।

विकसित देशों की जिम्मेदारी

पियूष गोयल ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि विकसित देशों ने वैश्विक जलवायु संकट को उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनका कहना है कि इन देशों को अपने वादों को पूरा करते हुए विकासशील देशों को समर्थन देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु वित्त के लिए $100 बिलियन का वादा किया गया था, लेकिन अभी तक भारत जैसे विकासशील देशों को इसका कोई लाभ नहीं मिला है।

गोयल के अनुसार, यह अत्यंत आवश्यक है कि विकसित देश अपने द्वारा किए गए वादों को निभाएं। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन की समस्या को हल करना और भी कठिन हो जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सभी देशों को मिलकर काम करना होगा।

पेरिस समझौते का महत्व

पेरिस समझौता एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना है। इस संधि के तहत विकसित देशों ने विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देने का वादा किया था। लेकिन गोयल के अनुसार, इस वादे का पालन नहीं किया जा रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत जैसे देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने के लिए अपनी विकास योजनाओं को जारी रखना होगा, भले ही विकसित देशों से समर्थन की कमी हो। यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण गरीब देशों पर अधिक प्रभाव पड़ता है।

भविष्य की दिशा

गोयल के इस बयान का वैश्विक स्तर पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। यह विकसित देशों को अपनी जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक कर सकता है और उन्हें अपने वादों को पूरा करने के लिए प्रेरित कर सकता है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए, यह आवश्यक है कि वे जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अपनी लड़ाई को जारी रखें, भले ही बाहरी समर्थन सीमित हो।

इस संदर्भ में, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विकसित देश आगे क्या कदम उठाते हैं। क्या वे अपने वादों को निभाएंगे, या फिर यह स्थिति यथावत बनी रहेगी? यह सवाल वैश्विक जलवायु नीति के लिए महत्वपूर्ण है।

Source: NDTV India

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