पंजाब सरकार ने आतंकवाद मामलों की सुनवाई को गुप्त और बेनाम बनाने का प्रस्ताव रखा है। इसका मकसद न्यायाधीशों और गवाहों की सुरक्षा करना बताया जा रहा है। हालांकि, इस विधेयक को लेकर विपक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका मानना है कि यह संविधान के खिलाफ है, क्योंकि आतंकवाद के मामलों में खुले और निष्पक्ष सुनवाई की आवश्यकता है।
विधेयक का प्रस्ताव और विपक्ष की प्रतिक्रिया
पंजाब विधानसभा में प्रस्तावित आतंकवाद विरोधी (पंजाब संशोधन) विधेयक 2026 का उद्देश्य न्यायाधीशों, अभियोजकों, बचाव पक्ष के वकीलों और गवाहों की पहचान को गोपनीय रखना है। विपक्ष के विधायक राणा आफताब अहमद खान ने इसका विरोध किया और कहा कि यह संविधान के खिलाफ है। इस विधेयक पर सोमवार को वोटिंग होनी है।
गोपनीय सुनवाई की प्रक्रिया
विधेयक के अनुसार, सरकार एक ग्रेड 20 अधिकारी को नामित कर सकती है, जो मामलों को ‘असाधारण सुरक्षा’ के तहत गोपनीय तरीके से ले सकता है। यह अधिकारी अभियोजक चुनने, गवाह कोड जारी करने और वीडियो ट्रायल के लिए नियम बनाने का अधिकार रखेगा। इस प्रक्रिया में न्यायाधीश की भूमिका सीमित हो जाएगी।
संविधान और निष्पक्ष न्याय की आवश्यकता
संविधान के अनुच्छेद 10A के अनुसार, किसी भी आरोपित को निष्पक्ष सुनवाई और उचित प्रक्रिया का अधिकार है। विधेयक की आलोचना में कहा गया है कि गुप्त सुनवाई संविधान के इस प्रावधान का उल्लंघन करती है।
विधेयक की संवैधानिकता पर सवाल
विपक्ष का कहना है कि इस विधेयक को पेश करने से पहले इसे एक विशेष समिति को भेजा जाना चाहिए था। इसके अलावा, यह भी कहा गया है कि आतंकवाद विरोधी अधिनियम (ATA) को राज्य स्तर पर संशोधित करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि यह एक संघीय कानून है।
